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धर्म-संसार

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती 2026: जानिए तिथि, आर्य समाज की स्थापना और आधुनिक सन्देश

Republic Today
Last updated: 25 जनवरी 2026 7:36 अपराह्न
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“हर कार्य का उद्देश्य मानव जाति का कल्याण होना चाहिए।” – महर्षि दयानंद सरस्वती

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती 2026 में 12 फरवरी, बुधवार को मनाई जाएगी। यह दिन हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को पड़ता है। महर्षि दयानंद सरस्वती ने 19वीं सदी में आर्य समाज की स्थापना करके भारतीय समाज में क्रांतिकारी बदलावों की नींव रखी, जिसका प्रभाव आज तक देखने को मिलता है।

Contents
  • जयंती 2026: तिथि एवं महत्वपूर्ण समय
  • महर्षि दयानंद सरस्वती: एक क्रांतिकारी संत का जीवन परिचय
  • आर्य समाज की स्थापना और दस सिद्धांत
  • सामाजिक सुधारों में योगदान:
  • ‘सत्यार्थ प्रकाश’: एक कालजयी रचना
  • जयंती समारोह: देशभर में कैसे मनाई जाती है?
  • आधुनिक भारत के लिए प्रासंगिकता: क्यों याद किए जाते हैं महर्षि दयानंद?
  • महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती 2026: विशेष आयोजन
  • निष्कर्ष:

जयंती 2026: तिथि एवं महत्वपूर्ण समय

2026 में महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती का पर्व राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाएगा।

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विवरणतिथि/समयटिप्पणी
हिंदू तिथिफाल्गुन कृष्ण दशमीपंचांग के अनुसार जयंती तिथि
ग्रेगोरियन तिथि12 फरवरी 2026, बुधवारराष्ट्रव्यापी समारोह इसी दिन
मुख्य समारोहप्रातः 8 बजे से सायं 6 बजे तकदेश भर के आर्य समाज मंदिरों एवं संस्थानों में
छुट्टी का प्रकारप्रतिबंधित अवकाश (Restricted Holiday)सरकारी कार्यालय खुले रहेंगे, कर्मचारी अवकाश ले सकते हैं

महर्षि दयानंद सरस्वती: एक क्रांतिकारी संत का जीवन परिचय

महर्षि दयानंद सरस्वती का मूल नाम मूलशंकर तिवारी था और उनका जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कम उम्र में ही उनके मन में धार्मिक प्रश्न उठने लगे थे। एक बार शिवरात्रि के दिन उन्होंने चूहों को शिवलिंग पर चढ़ी भेंट चढ़ाते देखा, जिससे उनके मन में मूर्ति पूजा के प्रति गहरा संशय पैदा हुआ।

25 वर्ष की आयु में उन्होंने घर त्याग दिया और 24 वर्ष तक देश भ्रमण करते हुए विभिन्न धार्मिक गुरुओं से ज्ञान प्राप्त किया। उनके आध्यात्मिक गुरु स्वामी विरजानंद थे, जो अंधे थे लेकिन अद्भुत ज्ञानी थे। गुरु दक्षिणा के रूप में स्वामी विरजानंद ने उनसे वेदों का प्रचार-प्रसार और समाज सुधार का कार्य करने का वचन लिया।

आर्य समाज की स्थापना और दस सिद्धांत

सन् 1875 में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। उन्होंने इस संस्था के माध्यम से वैदिक मूल्यों की वापसी और सामाजिक कुरीतियों के विरोध का अभियान चलाया। आर्य समाज के दस सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं:

  1. सभी ज्ञान का मूल स्रोत ईश्वर है
  2. ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान और न्यायकारी है
  3. वेद सभी सत्य विद्याओं की पुस्तक हैं
  4. सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सदैव तत्पर रहना चाहिए
  5. सभी कार्य धर्मानुसार, अर्थात सत्य और असत्य की विवेचना करके करने चाहिए
  6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है
  7. सभी के साथ प्रेमपूर्वक, धर्मानुसार व्यवहार करना चाहिए
  8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए
  9. प्रत्येक को अपनी उन्नति से संतुष्ट न रहकर सबकी उन्नति में हित चाहिए
  10. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियमों का पालन करना चाहिए

सामाजिक सुधारों में योगदान:

19वीं सदी के भारत में महर्षि दयानंद सरस्वती ने ऐसी कई सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई जो आज अकल्पनीय लगती हैं:

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1. नारी शिक्षा और सशक्तिकरण: उस समय जब लड़कियों की शिक्षा पर रोक थी, महर्षि दयानंद ने स्त्री-शिक्षा को अनिवार्य बताया। उनका कहना था कि “जिस समाज में नारियों का आदर नहीं, वह समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता।” उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का भी समर्थन किया।

2. जाति प्रथा का विरोध: उन्होंने जन्म आधारित जाति व्यवस्था को वेद विरुद्ध बताया और गुण-कर्म के आधार पर समाज की कल्पना की। उनका मानना था कि “जाति-पाति का भेद मनुष्य की बनाई हुई व्यवस्था है, ईश्वर की नहीं।”

3. बाल विवाह और पशु बलि का विरोध: उन्होंने बाल विवाह की कड़ी निंदा की और वैदिक यज्ञों में पशु बलि का खंडन किया। उनका तर्क था कि वेदों में यज्ञ का अर्थ है “सत्कर्मों का सम्पादन”, न कि पशुओं की हिंसा।

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‘सत्यार्थ प्रकाश’: एक कालजयी रचना

महर्षि दयानंद सरस्वती की सबसे प्रसिद्ध रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ 1875 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक समाज सुधार का घोषणापत्र है। इसमें 14 समुल्लास (अध्याय) हैं जो विभिन्न धर्मों, दर्शनों और सामाजिक प्रथाओं का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। लाला लाजपत राय, भगत सिंह, स्वामी श्रद्धानंद जैसे क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों ने इस पुस्तक से प्रेरणा प्राप्त की। भगत सिंह ने तो अपनी जेल डायरी में इस पुस्तक के कई उद्धरण लिखे थे।

जयंती समारोह: देशभर में कैसे मनाई जाती है?

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती के अवसर पर देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं:

आर्य समाज मंदिरों में विशेष कार्यक्रम: देश के लगभग 10,000 से अधिक आर्य समाज मंदिरों और शाखाओं में भव्य समारोह होते हैं। इनमें वेद पाठ, हवन, कीर्तन और प्रवचन आयोजित किए जाते हैं। दिल्ली के प्रसिद्ध आर्य समाज मंदिर करोल बाग में तो हज़ारों लोग एकत्रित होते हैं।

शैक्षणिक संस्थानों में कार्यक्रम: दयानंद एंग्लो-वैदिक (डीएवी) संस्थानों के लगभग 900 स्कूलों और कॉलेजों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें भाषण प्रतियोगिता, निबंध लेखन और संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं जहाँ महर्षि के विचारों पर चर्चा होती है।

सामाजिक सेवा कार्य: आर्य समाज के स्वयंसेवक इस दिन रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच शिविर और वस्त्र वितरण जैसे कार्यक्रम आयोजित करते हैं। यह महर्षि के “संसार का उपकार करना” के सिद्धांत को व्यवहार में लाने का प्रयास है।

मीडिया कार्यक्रम: टेलीविजन चैनल और रेडियो स्टेशन महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन और विचारों पर विशेष कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। कई समाचार पत्र विशेष लेख और स्तंभ प्रकाशित करते हैं।

आधुनिक भारत के लिए प्रासंगिकता: क्यों याद किए जाते हैं महर्षि दयानंद?

2026 का भारत 19वीं सदी से बहुत अलग है, फिर भी महर्षि दयानंद सरस्वती के विचार आज भी प्रासंगिक क्यों हैं?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पक्षधर: महर्षि दयानंद ने अंधविश्वास और रूढ़ियों के विरुद्ध तर्कशीलता को बढ़ावा दिया। आज के विज्ञान प्रधान युग में यह दृष्टिकोण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका कहना था कि “जो बात तर्क और युक्ति से सिद्ध न हो, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।”

शिक्षा पर जोर: उन्होंने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को समाज सुधार की कुंजी माना। आज जब नई शिक्षा नीति पर चर्चा हो रही है, महर्षि का मातृभाषा में शिक्षा का सिद्धांत विशेष रूप से प्रासंगिक लगता है।

सामाजिक समरसता: जाति, लिंग और धर्म के आधार पर बँटे समाज में महर्षि दयानंद का सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश एक उम्मीद की किरण है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “मनुष्य-मनुष्य में भेद करना मानवता के विरुद्ध है।”

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती 2026: विशेष आयोजन

इस वर्ष महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती पर कुछ विशेष आयोजनों की योजना बनाई गई है:

  1. राष्ट्रीय वेबिनार श्रृंखला: “युवाओं के लिए दयानंद दर्शन” विषय पर तीन दिवसीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा जिसमें देश-विदेश के विद्वान भाग लेंगे।
  2. सत्यार्थ प्रकाश का डिजिटल संस्करण: महर्षि दयानंद की मुख्य रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का निःशुल्क डिजिटल संस्करण जारी किया जाएगा जिसे आर्य समाज की आधिकारिक वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकेगा।
  3. राष्ट्रीय युवा सम्मेलन: दिल्ली के रामलीला मैदान में देशभर के युवाओं का सम्मेलन आयोजित किया जाएगा जहाँ महर्षि के विचारों पर चर्चा होगी।

निष्कर्ष:

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती केवल एक जन्मदिन समारोह नहीं, बल्कि भारतीय पुनर्जागरण के एक मुख्य स्तंभ को याद करने का अवसर है। उनके विचारों ने न केवल 19वीं सदी के भारत को बदला, बल्कि एक ऐसी विचारधारा की नींव रखी जो आज तक प्रेरणा देती है।

आधुनिक भारत की चुनौतियों – शिक्षा में गुणवत्ता, सामाजिक समरसता, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण – के समाधान महर्षि दयानंद के विचारों में छिपे हैं। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि साहसिक सुधार और मूल्यों पर दृढ़ता से ही समाज का कल्याण संभव है।

महर्षि दयानंद सरस्वती की 202वीं जयंती पर आइए हम उनके सपनों के भारत के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हों – एक ऐसा भारत जो ज्ञान, तर्क और समानता पर आधारित हो, जहाँ हर व्यक्ति को गरिमा और अवसर मिले।

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