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Saddam Hussein का ‘The President’s Cake’ : जब बच्चों की मासूमियत छीन लेती थी तानाशाही, इराकी फिल्म ने उकेरा दर्द

Last updated: 1 मार्च 2026 8:40 अपराह्न
Mohit Choudhary
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The President’s Cake: एक ऐसा दौर, जब किसी भी दिन स्कूल से घर लौटते बच्चे की आंखों में सिर्फ पढ़ाई की चिंता नहीं, बल्कि एक खौफ होता था। खौफ इस बात का कि कहीं कल उसका नाम उन बच्चों की लिस्ट में न आ जाए, जिन्हें तानाशाह के जन्मदिन पर उपहार देने के लिए चुना जाएगा। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि 1990 के दशक के इराक की भयानक हकीकत है, जिसे अब इराकी फिल्म निर्देशक हसन हादी ने अपनी बहुचर्चित फिल्म ‘द प्रेसिडेंट्स केक‘ में पिरोया है।

Contents
  • The President’s Cake: फिल्म की कहानी
  • तानाशाही का मनोविज्ञान: ‘दीवारों के भी कान होते हैं’
  • क्या आज भी मंडरा रहा है तानाशाही का खतरा?
  • निष्कर्ष:

अमेरिकी पब्लिक रेडियो एनपीआर (NPR) से हालिया बातचीत में हसन हादी ने उस दौर को याद किया, जब सद्दाम हुसैन का जन्मदिन एक राष्ट्रीय अनिवार्य अवकाश होता था, लेकिन आम लोगों के लिए यह खुशी का दिन नहीं, बल्कि आतंक का पर्याय था। हादी कहते हैं, “मेरे एक दोस्त का नाम उन बदकिस्मत बच्चों में आ गया, जिन्हें सद्दाम के लिए केक बनाना था। यह सबसे मुश्किल काम था, क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण देश में आटा, चीनी और अंडे जैसी मूलभूत चीजों का भी अकाल था।”

हादी के मुताबिक, वह दोस्त केक के लिए सामान जुटा नहीं सका। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी मासूम बच्चे के साथ नहीं होना चाहिए। उसे स्कूल से निकाल दिया गया और फिर सद्दाम हुसैन के बाल सैनिकों (चाइल्ड सोल्जर्स) में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया गया। यही वह दर्दनाक याद थी, जिसने हसन हादी को यह फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया।

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The President’s Cake: फिल्म की कहानी

‘द प्रेसिडेंट्स केक’ 9 वर्षीय बच्ची लामिया (बनीन अहमद नय्यफ) की कहानी है, जिसे स्कूल की ओर से राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के जन्मदिन समारोह के लिए केक बनाने का आदेश मिलता है। हसन हादी बताते हैं कि तानाशाही व्यवस्था जानबूझकर असफल होने पर मिलने वाली सजा को अस्पष्ट (ambiguous) रखती है। यह अस्पष्टता ही सबसे बड़ा हथियार होती है। “आपको ठीक से पता नहीं होता कि क्या होगा, लेकिन इतना जरूर पता होता है कि सजा तय है और वह बहुत क्रूर होगी। इस डर के कारण आप बिना सवाल किए हुक्म मान लेते हैं,” हादी कहते हैं।

लामिया के लिए यह यात्रा एक हीरोइक जर्नी से कम नहीं है। वह अपने पालतू मुर्गे हिंदी और अपने सबसे अच्छे दोस्त सईद (सजाद मोहम्मद कासिम) के साथ अंडे, आटा और चीनी जुटाने के लिए निकल पड़ती है। फिल्म की खूबसूरती यह है कि इसमें दिखाए गए बच्चों ने पहले कभी अभिनय नहीं किया है, जिससे उनका डर और मासूमियत बिल्कुल असली लगती है।

तानाशाही का मनोविज्ञान: ‘दीवारों के भी कान होते हैं’

हादी ने फिल्म के जरिए यह दिखाने की कोशिश की है कि कैसे सद्दाम हुसैन की खुफिया राज्य (surveillance state) ने आम लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ कर दिया था। लोगों को जासूसी करने के लिए मजबूर किया जाता था। फिल्म में एक डायलॉग है – “दीवारों के भी कान होते हैं,” जो उस दौर के माहौल को बखूबी बयां करता है।

निर्देशक कहते हैं, “आप किसी पर भरोसा नहीं कर सकते थे। न अपने माता-पिता पर, न अपने साथी पर, न अपने दोस्तों पर। यह एक ऐसे अपमानजनक परिवार में बड़े होने जैसा था, जहां आप हर वक्त खतरे को महसूस करते हैं। यह निरंतर डर समाज की नैतिकता और मानवीय रिश्तों की नींव को हिला देता है।”

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हालांकि फिल्म का विषय गंभीर है, लेकिन हादी ने इसमें गर्मजोशी और हास्य का पुट भी दिया है। बगदाद और मेसोपोटामिया के दलदली इलाकों (marshes) में शूट की गई इस फिल्म में दृश्य बेहद खूबसूरत हैं, जहां लामिया अपनी दादी के साथ नाव में बैठी महाकाव्य गिलगमेश (Epic of Gilgamesh) की कहानियां सुनती है। फिल्म ने पिछले साल कान्स फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ पहली फीचर फिल्म का प्रतिष्ठित कैमरा डी’ओर (Caméra d’Or) पुरस्कार जीता था।

क्या आज भी मंडरा रहा है तानाशाही का खतरा?

हसन हादी का मानना है कि उनकी फिल्म सिर्फ 1990 के दशक की कहानी नहीं है, बल्कि आज के वैश्विक परिदृश्य में यह और भी प्रासंगिक हो जाती है, जहां कई जगहों पर सत्तावादी नेताओं (authoritarian leaders) का उदय हो रहा है। वह चेतावनी देते हुए कहते हैं, “दुनियाभर में बहुत सारे लाल झंडे (red flags) दिख रहे हैं। तानाशाह नेताओं के लिए एक तरह की पुरानी यादों (nostalgia) को फिर से महसूस किया जा रहा है। यही असली खतरा है, जब किसी का जन्मदिन राष्ट्रीय विषय बन जाए, उसका नाम हर जगह दिखे। यह सब मुझे इराक में बड़े होने के अपने उस दौर की याद दिलाता है।”

निष्कर्ष:

‘द प्रेसिडेंट्स केक’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि इतिहास का वह दर्पण है, जो हमें दिखाता है कि तानाशाही और अमानवीय शासन आम आदमी, खासकर बच्चों के मासूम दिमाग पर क्या गहरे जख्म छोड़ जाता है। यह फिल्म प्रेम, दोस्ती और बलिदान की ताकत को भी दर्शाती है, जो इंसान को सबसे बुरे वक्त में भी जीने की राह दिखाती है। यह कहानी हमें आगाह करती है कि आजादी और लोकतंत्र की कीमत को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: फिल्म ‘द प्रेसिडेंट्स केक’ किस वर्ष रिलीज हुई थी?
उत्तर: फिल्म ने वर्ष 2025 में कान्स फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार जीता था। यह फिल्म 2025-26 में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाई गई।

प्रश्न: फिल्म के निर्देशक हसन हादी ने यह फिल्म क्यों बनाई?
उत्तर: हसन हादी के बचपन के एक सच्चे अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने यह फिल्म बनाई, जब सद्दाम हुसैन के जन्मदिन के लिए केक न बना पाने के कारण उनके एक स्कूली दोस्त को बाल सैनिक बना दिया गया था।

प्रश्न: फिल्म में सद्दाम हुसैन के शासन के किन पहलुओं को दिखाया गया है?
उत्तर: फिल्म में सद्दाम हुसैन के शासन में व्याप्त अस्पष्ट लेकिन क्रूर सजा का डर, खुफिया राज्य और जासूसी का माहौल, अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण हुई भयानक कमी (अकाल) और समाज पर पड़ने वाले कुप्रभाव को दिखाया गया है।

प्रश्न: क्या यह फिल्म केवल इराक के इतिहास पर आधारित है या इसका आज के संदर्भ में भी महत्व है?
उत्तर: निर्देशक हसन हादी के अनुसार, यह फिल्म आज दुनिया में बढ़ते सत्तावादी रुझानों के खिलाफ एक चेतावनी है और यह बताती है कि कैसे तानाशाही के प्रति मोह (nostalgia) खतरनाक हो सकता है।

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ByMohit Choudhary
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खबरों के पढ़ने की दिलचस्पी ने खबर बनाने तक पहुंचा दिया. एक्टिंग में गहरी दिलचस्पी होने से आर्ट से गहरा नाता है. सिनेमा हर रोज देखना चाहता हूं. नई तकनीक से पाला पड़े तो अच्छा है, हर रोज कुछ नया करना चाहता हूं. जर्नलिज्म के तकरीबन 4 साल के एक्पीरियंस में देश-विदेश, स्पोर्ट्स, क्राइम जैसे अन्य विषयों पर वो खबरें लिखी है जो लोगों तक पहुंचनी चाहिए!
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